Saturday, 29 August 2020

हाँकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का जीवन परिचय | Major Dhyanchand Biography in Hindi

मेजर ध्यानचंद का जीवन परिचय (Major Dhyanchand Biography in Hindi)- 

नमस्कार, दोस्तों कहते हैं कि जब हिटलर ने मेजर ध्यानचंद के जबर्दस्त खेल से प्रभावित होकर इनको  जर्मनी की सेना में ऊचे पद, दौलत की पेशकश की तो उस वक़्त  हिटलर के इस पेशकश को ठुकराने वाले मेजर ध्यानचंद के यही शब्द थे-

"कि मैंने भारत का नमक खाया है, मैं भारत के लिए ही खेलूँगा."

ऐसे सच्चे महान देशभक्त, भारत  माता के गौरव पुत्र थे मेजर ध्यानचंद जिन्होंने कभी नंगे पाँव खेलकर भारत को 1928, 1932 एवं  1936 में ओलम्पिक का गोल्ड मेडल दिलवाया था .       

बताया जाता है हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद नंगे पैर चांदनी रात में हाकी का अभ्यास किया करते थे. जी हां दोस्तों बिल्कुल सही सुना आपने वहीँ हाकी के इस सर्वकालिक महान खिलाड़ी जब हॉकी के खेल में गोल दागा करते थे न तो मैदान में मौजूद सब के सब हैरान रह जाते थे. क्योकि मेजर ध्यानचंद का  गोल करने का तरीका जबर्दस्त था जो सबको मंत्रमुग्ध कर देता था. और तो और दोस्तों  कई बार हाकी के इस जादूगर की हाकी स्टिक को तोड़कर देखा जाता था कि कहीं इसमें किसी तरह का कोई चुम्बक तो नहीं लगा है.



लेकिन  हर बार इनके हाकी स्टिक को चेक करने वाले लोग सिर्फ और सिर्फ निराश हुए बस. इनके जीवन से सम्बंधित एक और घटना है कि बताया जाता है की जब भारत माता का यह लाल जब भारत के लिए जबसे हाकी खेलना शुरू किया तब से भारत  हॉकी की दुनिया की सर्वश्रेष्ट टीम बन गया था. क्योंकि ध्यानचंद जी ने अपनी अपना पूरा दिल और दिमाग सिर्फ हाकी खेलने में लगा दी थी.

इस प्रकार भारत की हॉकी टीम को सर्वश्रेष्ट बनाने में, आज हम मेजर ध्यानचंद सिंह और उनके सुनहरे जीवन के बारें में आपको विस्तार से बताने वाले हैं तो चिपके रहिए हमारे इस आर्टिकल के साथ. 




मेजर ध्यानचंद का प्रारंभिक जीवन (Major Dhyanchand Birth & Family) -

दोस्तों हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त सन 1905 को इलहाबाद ( जिसे अब प्रयागराज कहा जाता है ) में हुआ था. इनका जन्म एक कुशवाह मौर्य समाज में हुआ था. मेजर ध्यानचंद  के पिता का नाम श्री रामेश्वर जी था और वह ब्रिटिश आर्मी में सूबेदार के पद पर थे. इसी कारण  से उनका तबादला आये दिन होता रहता था.

जहा तक इनके पढाई- लिखाई की बात है तो आपको बता दें कि हाकी का यह महान जादूगर  बहुत ही मुश्किल से अपनी पढाई मात्र छटवी कक्षा तक कर पाई थी और किसी कारणवश बाद में पढाई छोड़ दी क्योंकि उनके पिता के तबादले की वजह से वह ठीक से पढ़ नहीं पाते थे. कुछ समय बाद  उनके पिता झांसी में आकर बस गए. यहीं  पर उन्होंने रेसिंग करना शुरू किया क्योंकि उन्हें हॉकी खेलना पसंद नहीं था.




मेजर ध्यानचंद  का हॉकी से लगाव -

दोस्तों मेजर ध्यानचंद उस दिनों  रेसिंग करने में तो सक्षम थे, ऐसे में उनके एक मित्रों ने  उन्हें हॉकी खेलने के लिए दबाव डालने लगे क्योकि मेजर ध्यानचंद जी के पास एथलीट वाला शरीर था जिसे देखकर इनके दोस्त इनको हाकी के लिए बाध्य करते. दोस्तों के कहने पर मेजर ध्यानचंद उसके बाद अपने  दोस्तों के साथ हॉकी खेलना शुरू किया और कुछ ही समय बाद हाकी उनका पसंदीदा खेल भी हॉकी बन गया. इस तरह मेजर ध्यानचंद ने हाकी खेलने की शुरुवात की.

एक दिन की बात है ध्यानचंद जी अपने पिता के साथ आर्मी कैंप का हॉकी मैच देखने गयेi और वहां पहुचकर उन्होंने देखा की एक टीम हार रही है, तो यह सब इनसे देखा नहीं गया और ठीक उसी वक़्त  अपने पिता से कहा की वह हारने वाली टीम के लिए खेलना चाहते है. क्योकि वह मैच आर्मी वालों का था तो ध्यानचंद के पिता ने उन्हें खेलने की अनुमति  दे दी. इस प्रकार मेजर ध्यानचंद ने यहाँ अपने  टीम के लिए 4 गोल कर डाले , बस यहीं पर  आर्मी के ऑफिसर ने उनका जबर्दस्त आत्मविश्वास देखकर उन्हें आर्मी ज्वाइन करने के लिए कह दिया और इस तरह सन 1922 में मेजर ध्यानचंद  पंजाब रेजिमेंट में एक सिपाही बन गये.



कुछ समय बाद उसके बाद ब्राह्मण रेजिमेंट सूबेदार मेजर भोले तिवारी ने उन्हें खेल का ज्ञान विस्तार पूर्वक दिया और ध्यानचंद के पहले कोच पकंज गुप्ता थे. उन्होंने ही ध्यानचंद का खेल देखकर कहा की एक दिन यह मेजर  "चाँद की तरह चमकेगा", और दोस्तों कुछ समय के बाद  उनकी यह बात 24 कैरेट सच भी हुई और उसी वक्त उन्हें ध्यान सिंह से "चंद" की उपाधि मिल गयी.


ध्यानचंद का हॉकी कैरियर ( Major Dhyanchand Hockey Career)-

दोस्तों आपको बता दें की हॉकी के खेल में ध्यानचंद हमेशा श्रेष्ठ  रहे और उनका दमदार खेल देखकर सब यह सोचकर हैरान रह जाते की यह खिलाड़ी किस प्रकार खेलता है और वह यह कहने पर मजबूर हो जाते की वाह क्या खेल दिखाया.

इसप्रकार हाकी का यह खिलाड़ी दुनिया भर के हाकी प्रशंसको के दिलो को जित चुका था. उनके जीवन की बहुत सी घटनाएं हैं जिनमें से कुछ का आगे हम जिक्र कर रहे हैं .

जहां पर मेजर ध्यानचंद ने अपना सर्वश्रेष्ट प्रदर्शन किया है. हम बात करते है उनके पहले नेशनल हॉकी टूर्नामेंट जो की सन 1925 में हुआ था. इसमें उनके दमदार  प्रदर्शन को देखकर उनका चयन इंटरनेशनल हॉकी टीम में हुआ.





ध्यानचंद का  बायोडाटा ( Major Dhyanchand Biodata) -

पूरा नाम -     ध्यानचंद सिंह

उपनाम  -     मेजर ध्यानचंद सिंह

ओलम्पिक में स्वर्ण -  1928, 1932 व  1936 

हाकी की दुनिया में अलंकरण-   हॉकी के जादूगर

जन्म -           5 अगस्त सन 1905

पद    -            पंजाब रेजिमेंट में मेजर पद 

व्यवसाय -       हॉकी खिलाड़ी (फारवर्ड )

सम्मान  -        पद्मभूषण 

भारत के लिए हाकी खेली -     सन 1926 से 1948 तक 

हाकी कैरियर में कुल गोल -  1000 से भी अधिक 

अन्तराष्ट्रीय में कुल गोल -   400

मृत्यु     -          3 दिसंबर 1979


मेजर ध्यानचंद का पहला अन्तर्राष्ट्रीय मैच (Major Dhyanchand First Hockey Match) -

दोस्तों आपको बता दें कि मेजर ध्यानचंद का पहला मैच न्यूजीलैंड में हुआ था यहाँ पर भारतीय टीम ने दनादन 20 गोल कर डाले और दोस्तो इसमें सबसे बड़ी बात यह है की 10 गोल अकेले ध्यानचंद ने किये थे. भारत ने यहाँ पर 21 मैच खेले और जिसमें से 18 मैचो में भारत ने जीत हासिल की. इस जीत का काफी हद तक श्रेय मेजर ध्यानचंद को मिला था और मिलता भी क्यों न क्योकि पुरे टूर्नामेंट में 192 गोल हुए और इनमे से 100 गोल अकेले हाकी का यह जादूगर के थे. 

इस तरह अब आप आसानी से सोच सकते हैं की ऐसे ही उन्हें "हॉकी का जादूगर" नहीं कहा जाता है. दोस्तों आपको बता दें कि मेजर ध्यानचंद के कैरियर में भारत ने लगातार तीन बार गोल्ड मेडल जीतकर हाकी की दुनिया में भारत की बादशाहत साबित की थी.

और तो और दोस्तों इनके जीवन की एक और घटना आपको बता दें कि मेजर ध्यानचंद  के अपने खेल के दुर्लभ  आत्म समर्पण एवं जबर्दस्त आत्मविश्वास  को देखकर जर्मनी का बादशाह हिटलर भी इनके आशिक हो गये थे. ओलम्पिक के में जर्मनी के खिलाफ हुए एक मैच में मेजर ध्यानचंद के शानदार खेल को देखकर हिटलर इनसे इतना प्रभावित हुआ की मैच के बाद हिटलर ने इन्हें जर्मन आर्मी में हाई पोस्ट ऑफर कर डाली और मज़े की बात यह है की भारत माता का यह सच्चा देशभक्त मेजर ने यह कहकर मना कर दिया की वह अपने वतन भारत को नहीं छोड़ेंगे चाहे इसके लिए उन्हें किसी भी चीज़ से समझौता करनी पड़े.

 जब नंगे पाँव खेले थे जर्मनी के खिलाफ -

 दोस्तों बर्लिन ओलम्पिक में भारत ने तीन टीम के साथ गेम खेला, यह मैच 1932 में हुआ था इस खेल में हंगरी, अमेरिका और जापान को भारत ने जीरो गोल में हरा दिया था. उसके बाद फाइनल मैच जर्मनी के साथ हुआ. इस मैच में इंटरवल तक भारत के खाते में एक भी गोल नहीं था उसके बाद मैदान में मेजर ध्यानचंद की हाकी स्टिक ने अपना जादू बिखेरना शुरू किया और इन्होंने अपने अपने जूते उतार दिए और नंगे पाँव ही एक के बाद एक शानदार गोल करने शुरू किये.

दोस्तों  आपको बता दें भारत ने यह मैच यह 8-1 से जीत लिया . ओलम्पिक में यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी मेजर  ध्यानचंद एवं पुरे भारत के लिए क्योंकि अगर यह मैच भारत हार जाता तो भारत की जीत फीकी पड़ जातीलेकिन मेजर ध्यानचंद और पूरी भारतीय टीम भारत को इस मैच में जीत दिलाकर ही दम लिया..


मेजर ध्यानचंद  की मृत्यु (Major Dhyanchand Death) -

दोस्तों हाकी के सर्वकालिक महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद जी हॉकी सन 1948 तक खेलते रहे और अपने हाकी के पूरे जीवनकाल में उन्होंने 1000 से भी ज्यादा गोल किये थे को की एक विश्व रिकार्ड है. इन्होंने बाद में हाकी से रिटायरमेंट ले ली और आपको बता दें  की मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन पर ही भारत हर साल 29 अगस्त को खेल दिवस मनाता है.

मेजर ध्यानचंद के जीवन के आखिरी कुछ समय  में उनको पैसों की काफी तंगी का सामना करना पड़ा और इसी दौरान उनकी लीवर में कैंसर होने की वजह से AIMS के जनरल वार्ड में इन्होंने अपने जीवन की अंतिम सांस ली.  इस प्रकार हाकी का यह सर्वकालिक महान खिलाड़ी 3 दिसंबर सन 1979 को सदा के लिया इस दुनिया को छोड़कर चला गया.

मेजर ध्यानचंद के जीवन की उपलब्धियां (Major Dhyanchand Life Achivement)- 

हॉकी के इस महान खिलाड़ी ने अपने जीवन में बहुत कुछ प्राप्त किया जैसे मान-सम्मान, इज्जत,शोहरत,यश आदि  है. आज भी भारत के साथ पुरे दुनियाभर में हाकी के इस जादूगर के बारे में ढेर सारी बातें होती रहती है और आज भारत हर वर्ष इनके याद में "खेल दिवस" भी मनाता है. 

मेजर ध्यानचंद ही वह व्यक्ति है जिसने ओलम्पिक में भारत को पहला "गोल्ड मेडल" दिलवाया था. उनके जीवन की कुछ उपलब्धियां आपको बता रहे हैं –

1. सन 1956 में मेजर ध्यानचंद जी को "पद्म भूषण" सम्मान से अलंकृत किया गया था.

2. इनकी याद में भारत में डाक टिकट शुरू की गई.

3. भारत में इनके  जन्मदिन को खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है.

4. भारत की राजधानी दिल्ली में मेजर ध्यानचंद  के नाम पर ही एक स्टेडियम का निर्माण करवाया गया है.


मेरे प्यारे भाइयों एवं बहनों अंत में हम आप लोगों से कहना चाहते हैं कि मेजर ध्यानचंद के दिल में अपने देश के प्रति इतनी अपार देशभक्ति, अप्रतिम प्यार , जबर्दस्त आत्मसमर्पण, श्रद्धा एवं अपने खेल के प्रति अपार इच्छाशक्ति थी जिसके बदौलत इन्होंने भारत का नाम दुनिया के पटल पर स्वर्ण अक्षरों में अंकित करवाया, भारत माता के ऐसे सच्चे देशभक्त को मैं शत -शत नमन करता हूँ.    

धन्यवाद.














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