Wednesday, 27 November 2019

सरदार पटेल जीवनी | biography of sardar vallabhbhai patel

 नमस्कार दोस्तों, आपका स्वागत है हमारे  वेबसाइट पर. आज के इस पोस्ट में हम आप  लोगों को भारत के "लौहपुरुष" यानि सरदार वल्लभ भाई पटेल  जी की जीवनी के बारे  में बताने वाले हैं. तो चलिए शुरू करते हैं.
भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री रहे सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर सन 1875 को गुजरात के एक छोटे से गांव नाडियाड में हुआ था.
इनके पिता झावेर भाई पटेल एक किसान थे एवं इनकी माता का नाम लाडबाई था जो कि एक साधारण गृहणी थी.
वल्लभ भाई की प्रारंभिक शिक्षा  करमसद  में हुई, इसके बाद उन्होंने पेटलाद के एक विद्यालय में एडमिशन लिया. बल्लभ भाई ने हाई स्कूल की परीक्षा सन 1896 ई में पास  की.
आपको बता दें कि सरदार साहब अपने पूरे जीवन में एक मेधावी छात्र रहे थे और हर परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते थे.
इन्होंने अपने शुरुआती जीवन में ही तय कर लिया था कि इन्हें एक वकील बनना है और यह अपनी वकालत की डिग्री लंदन से लेना चाहते थे, लेकिन दुर्भाग्यवश उस वक़्त उनके पास इतने पर्याप्त पैसे नहीं थे जिससे वे वकालत की पढ़ाई लंदन तो दूर किसी भारतीय  विश्वविद्यालय से भी कर सकें.
                                 
                                     
लेकिन पढाई को लेकर इनकी इच्छाशक्ति इतनी दृढ़ थी की इन्होंने अपनी वकालत की पढ़ाई स्वयं से करना शुरू कर दिया और सफलतापूर्वक वकालत की परीक्षा को पास  करके वकालत की डिग्री भी ले ली.
इसी दौरान पटेल साहब  अदालतों के कार्यवाही में भाग लेने लगे जहां वे वकीलों को ध्यान से सुनते जिससे आगे इनको बहुत लाभ हुआ.
सरदार पटेल ने अपने  कैरियर की शुरुआत गुजरात के गोधरा नामक स्थान से की और उनकी जबर्दस्त  योग्यता के कारण जल्द ही  उनकी वकालत चल पड़ी.
सरदार साहब का विवाह झाबेरबा  नामक स्त्री से हुआ जिनसे  इनके दो पुत्र उत्पन्न हुए जिनका नाम  मडीबेन 1904 और पुत्र दहया  भाई 1905 था.
सरदार पटेल ने अपने बड़े भाई जिनका नाम विट्ठलभाई था, को कानून की उच्च शिक्षा दिलाने के लिए इंग्लैंड भेज दिए.
दोस्तों आप लोगो को बता दें कि वल्लभ भाई की  पत्नी का देहांत बहुत जल्द हो गया जब सरदार पटेल की उम्र मात्र 33 वर्ष थी. पत्नी का साथ जल्दी छोड़ जाने के बाद भी इन्होंने दूसरी शादी नहीं की.

इसके बाद अपने बड़े भाई के इंग्लैंड से  कानून की डिग्री लेने के बाद सरदार साहब भी लंदन चले गए और वहां जाकर खूब मेहनत से कानून की परीक्षा को प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और उसके बाद पटेल साहब सन 1913 में अपने वतन भारत लौटे और  गुजरात  राज्य के अहमदाबाद से अपनी वकालत शुरू की.
जल्द ही वल्लभ भाई  अपने इस पेशे में बहुत लोकप्रिय हो गए तथा अपने करीबियों व मित्रों के कहने पर सन 1917 में अहमदाबाद के सैनिटेशन कमिश्नर का चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीत भी गए.
उन्हीं दिनों पटेल साहब गांधी जी के चंपारण सत्याग्रह की सफलता से बहुत प्रभावित हुए.
वल्लभभाई का राजनीतिक जीवन खेड़ा में किसानों के  संघर्ष के साथ शुरू हुआ था, जिसमें उन्होंने आगे आकर जबर्दस्त  तरीके से नेतृत्व किया था. जिसका परिणाम यह हुआ कि ब्रिटिश सरकार ने राजस्व की वसूली पर रोक लगा दी एवं अपने द्वारा लगाए गए कर  को वापस ले लिया. जिसका  परिणाम स्वरुप यह संघर्ष 1919 में जाकर खत्म हो गया.
खेड़ा सत्याग्रह में प्राप्त सफलता से वल्लभ भाई की लोकप्रियता बहुत बढ़ गई जिसका परिणाम यह हुआ कि उनकी छवि एक राष्ट्रीय नायक की बन  कर जनता के सामने आयी.
गांधी जी के असहयोग आंदोलन और गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अमदाबाद से ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार के आयोजन में इन्होंने खूब मदद की.
इस दौरान इन्होंने स्वयं के विदेशी कपड़ों का त्याग कर दिया और खादी वस्त्र को ही अपने दैनिक जीवन में अपनाना शुरू किया.
उसके बाद इन्हें 1922, 1924 और 1927 में अहमदाबाद नगर निगम का अध्यक्ष चुना गया.इस दौरान वल्लभ भाई ने कई प्रकार के विकास संबंधी कार्य किए जिसमें बिजली की आपूर्ति को बढ़ाना, जल निकासी, स्वच्छता व्यवस्था और शिक्षा के क्षेत्र में जबर्दस्त  सुधार मुख्य रूप से शामिल है.
सरदार पटेल जी किसानों के परम हितैषी थे जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण 1928 में गुजरात का बरदोली तालुका बाढ़ और अकाल वाले घटना से समझा जा सकता है, जिसमें इन्होंने संकट की इस घड़ी में ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाए गए राजस्व करो को 30% बढ़ाने के विरोध में किसानों के साथ आये और ब्रिटिश सरकार के इस फैसले का जमकर विरोध किया.
 इन्होंने  किसानों  को एक साथ लाकर उनसे ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाए गए कर का  एक पाई भी ना चुकाने के लिए कहा, जिसका परिणाम यह हुआ कि ब्रिटिश सरकार को  सरदार साहब के  सामने झुकना पड़ गया.
वल्लभ भाई के इस सफलता के बाद इनका मान- सम्मान इतना बढ़ गया की लोग इन्हें "सरदार" नाम से संबोधित करने लगे.
इसके बाद 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान इन्हें गांधी जी के साथ गिरफ्तार कर लिया गया जिससे कि पूरे भारत में आंदोलन और तेज हो गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि ब्रिटिश सरकार ने इनको भी गांधी जी के साथ रिहा करने पर मजबूर हो गई.
इसके बाद कुछ समय बाद मुंबई में इनको पुनः  गिरफ्तार कर लिया गया एवं  वर्ष 1931 में गांधी- इरविन समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद जेल से रिहा कर दिया गया.
सन 1931 सत्र के लिए वल्लभ भाई को  कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया उसके बाद लंदन में हुए गोलमेज सम्मेलन की विफलता पर इन्हें  गांधी जी के साथ एक बार फिर 1932 में गिरफ्तार कर लिया  गया.
कारावास की इसी अवधि के दौरान पटेल और गांधी जी एक- दूसरे के करीब आये  और दोनों नेताओं के मध्य प्यार, भरोसा एवं स्पष्टवादीता का रिश्ता भी बना. अंत में जुलाई 1934 को सरदार साहब को  रिहा कर दिया गया.
इसी बीच 1942 में  कांग्रेस ने  भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ किया. इसी दौरान सरकार ने वल्लभभाई समेत कई कांग्रेसी विशिष्ट नेताओं को कारावास में डाल  दिया. सारे नेताओं को 3 साल के बाद छोड़ दिया गया.
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र  भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और सरदार वल्लभ भाई पटेल को उप प्रधानमंत्री बनाया गया.
इसके अलावा सरदार पटेल गृह मंत्रालय, सूचना प्रसारण मंत्रालय एवं राज्यमंत्री के पद की जिम्मेदारी भी संभाली.
जैसा कि आप सब जानते हैं आजादी के समय भारत में कुल 565 रियासतें थी एवं महाराजा एवं नवाब जिनका इन पर शासन था, देशभक्त थे.
लेकिन उनमें से ज्यादातर दौलत एवं  सत्ता के नशे में चूर थे. ऐसे में जब अंग्रेजों ने जब भारत छोड़ा, तब ये सारे नवाब  स्वतंत्र शासक बनने का सपना देखते थे.
जिसके लिए उन्होंने यह तर्क भी दिया कि स्वतंत्र भारत की सरकार उन्हें बराबरी का दर्जा दे, और तो और उनमें से कुछ तो संयुक्त राष्ट्र संगठन को अपना प्रतिनिधि भेजने की योजना बनाने की हद तक चले गए.
इसी बीच सरदार पटेल ने तत्कालीन भारतीय राजाओं से देश भक्ति का आह्वान किया और कहा कि वह देश की स्वतंत्रता से  जुडें  और एक जिम्मेदार शासक के जैसा बर्ताव करें, जो कि सिर्फ एवं सिर्फ अपनी प्रजा के अच्छे भविष्य के  के बारे में सोचें.
सरदार पटेल ने 565 रियासतों को स्पष्ट कर दिया कि अलग राज्य का जो सपना वे देख रहे हैं, उसका पूरा होना  असंभव है और भारतीय गणतंत्र का हिस्सा बनने  में ही भलाई है.
अतः भारत को गणतंत्र बनाने के लिए सरदार पटेल जी ने महान बुद्धिमत्ता एवं दूरदर्शिता का  परिचय देते हुए  छोटे- छोटे  रियासतों को एक साथ संगठित किया.पटेल जी की इस कार्य में भारत की जनता ने पूरा सहयोग किया.
इसी बीच 563 रियासतों के नवाब सरदार वल्लभ भाई के विचार से सहमत थे, लेकिन हैदराबाद के निजाम एवं जूनागढ़ के नवाब मानने को तैयार नहीं थे. जिन्हें पटेल ने अपनी राजनीतिक सूझबूझ से उनको भी अपने आगे झुकने को मजबूर कर दिया.
इस प्रकार पटेल साहब ने एक बिखरे हुए देश को बिना किसी भी रक्तपात एवं हिंसा के  एक कर दिया.
सरदार पटेल इसी महान कार्य के लिए इन्हें "लौह पुरुष" के नाम से संबोधित किया जाता है.
देश को आजाद हुए अभी मात्र 3 वर्ष हुए थे की सरदार पटेल जी की मृत्यु 15 दिसंबर सन 1950 ईस्वी को अचानक ह्रदय गति रुकने के कारण हो गया.
इस प्रकार भारत मां का यह लाल सदा के लिए इस दुनिया से अलविदा ले लिया. बाद में देश के लिए किए गए उनके महान कार्यों को याद करते हुए भारत सरकार ने इन्हें   सन  1991 में "भारत रत्न" से सुशोभित किया.
वल्लभ भाई के देश के लिए किये महान कार्यो के सम्मान में वर्तमान की  नरेन्द्र मोदी सरकार ने इनके स्मृति में दुनिया की सबसे ऊची  182 मीटर की मूर्ति (स्टेचू ऑफ़ यूनिटी ) गुजरात  स्थित नर्मदा नदी  पर  स्थापित करायी है.


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